मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

हम भी क़त्ल को चुपचाप सहने लगे..

वो मेरे दिल में आके रहने  लगे  
लोग इसको गुनाह कहने लगे .... 

जब हुआ कब्ज़ा किनारे चुप थे 
शोर  बरपा  जो  शहर  बहने   लगे ..

जब से तुमको खुदा बनाया है 
सारे मस्जिद जहाँ के ढहने  लगे .. 

खता कुछ तो है कातिल की मगर
हम भी क़त्ल को चुप सहने लगे..


तब अमावस याद आया मुझको बहुत
चांदनी मैं ये बदन दहने लगे


२८.दिसंबर 2010

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

कुछ फुटकर भाव

रोग कैसा लगा लिया तुमने.. 
खुद को ही आजमा लिया तुमने...
************************
थपकियाँ देलूँ सुला लूँ तुमको
आओ थोडा सा रुला लूँ तुमको
************************
तुम गीत बनकर मेरे लबो पर ठहर गए
मैं सो न सका रात के सारे पहर गए
*****************************
२२-१२-२०१०

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

मोहब्बत हो न जाये

मुझे तुमसे मोहब्बत हो न जाये 
सुकून मेरा कहीं पे खो न जाये 

इरादा तो है तुमको चूम लूँ पर 
तुम्हारा गाल जूठा हो न जाये
 
लोरी मां की अधूरी  रह ही गई है 
कहीं वो सुनते सुनते सो न जाए

रविवार, 5 दिसंबर 2010

आपका - अखिलेश

मित्रो ! आपका स्नेह मुझे मिलता रहता है.. कई बार मै व्यस्त होने की वजह से उत्तर नहीं दे पाता... आपसब क्षमा के साथ अपना स्नेह बनाए रखेंगे ... आपका - अखिलेश
मुफलिसी मुह चिढाती कुबेरों को है.
रेत पर जिंदा रहने लगी मछलियाँ ..
बज़्म में खून से कुछ सने हाथ हैं
उजले कपडे में वे हैं बड़ी हस्तियाँ ..

शनिवार, 13 नवंबर 2010

तू भी है

मै   हूँ  मुलजिम  , तो  गुनाहगार  तू  भी  है
मेरी  तरह   सज़ा  की  , तलबगार  तू  भी  है ..
मै  हूँ  खुशनसीब  , आगोश    में   तेरे
तो  बाँहों  में  मेरी  गिरफ्तार  तू  भी  है ..

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

तू जमीन है तू आसमान है मेरा
तू ही जन्नत है  तू ही हूर भी है

होश है तू है तू ही मदहोशी
नशा भी तू नशे में चूर भी है

खो न दूं तुमको ये darr  भी है
तू तो मेरी है ये गुरूर भी है

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

तू   मेरे   पास  भी  है  और  दूर  भी  है..
मेरी  बाहों  में  छिपी है .. मजबूर भी है... 
दुनिया बहुत बड़ी सही कूप मंडूकता उससे जीत जाती है ,,, मैं वापस आ गया  ,, अच्छा लगा वापस आना ,, जैसे कहीं गया ही न था ,, तुम फिर मिल गए ,,, वहीँ खडे मेरे इंतजार मैं ,, कुछ नहीं बदला ,,, दुनिया बड़ी है तो ठेंगे से

बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्या होगा.. ????

कहीं  सिमटा  हुआ  एक  पल  बिखर  जाए  तो  क्या  होगा  
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिहर जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें , एक छोटी  - सी दुनियां सफीने में ...
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो  क्या  होगा ????

रविवार, 18 जुलाई 2010

नज़रों से काम लेता है ..

अश्क   आँखों में थाम लेता है
अब तो कम कम वो जाम देता है
क़त्ल का उसके सलीका है अज़ब
सिर्फ नज़रों से काम लेता है ..


उसके होंठों पे एक लर्जिश  है
हाय   वो मेरा  नाम  लेता है 
रिंद  कोई  न आएगा कल से 
साकी तू दूना दाम लेता है ... 

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

मैंने चाहा तुझको

मैं अपनी नज़रों से नज़रें मिला नहीं पाया  
मैं  आईने  में  कभी  मुस्कुरा  नहीं  पाया ..
मुझे पता ही नहीं देखता मुझे कोई
मैं अपने साए में खुद को छिपा नहीं पाया ..
सभी खताओ से ज्यादा बड़ी खता ये हुई
बताना चाहा तुझे पर बता नहीं पाया ..
तेरी नज़र से गिरा तुमने उठाया झुक कर
मैं खुद की नज़रों में खुद को उठा नहीं पाया..
जुल्म इक और करूँ बस इसी लिए जिंदा
मैंने चाहा तुझको ये जता नहीं पाया ..
 

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

तुम्हारी याद आई

जश्न- ए- गम मैं भी मना लूँ तो चलूँ 
ख़त मुहब्बत  के जला लूँ तो चलूँ ..

जिसने ये गम दिया वो अपने थे 
बात गैरों से छिपा लूँ तो चलूँ ..

मेरा क़ातिल बहुत ही नादाँ है
सुराग - ए- क़त्ल मिटा लूँ तो चलूँ..

चाँद भी ज़ार-ज़ार रोता है 
थपकियाँ दे के सुलालूं तो चलूँ ..

आज फिर से तुम्हारी याद आई 
आज फिर तुमको भुलालूं तो चलूँ ..

सोमवार, 5 जुलाई 2010

कितना  मुश्किल  सवाल  पूछ  लिया  
आप ने  हाल - चाल  पूछ  लिया  ..... 

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

प्यार कर बैठा

ये  मैं  कैसा  गुनाह  कर  बैठा  
एक  मुसाफिर  था  प्यार  कर  बैठा .
मुझको  मंजिल तलाशती ही रही 
राह में क्यों मैं हार कर बैठा .

बेसबब मेरा दोस्त रोता है 
कब से मेरी मजार पर बैठा .
सबने मुझको बड़ी नसीहत दी 
फिर भी आँखें मैं चार कर बैठा........... 

शनिवार, 12 जून 2010

किया क्यों तुमने ऐसा काम
राम  रहीम    रब ईसा   
हाय!  रख लिए कितने नाम.....

शुक्रवार, 14 मई 2010

यूँ  तो  मैं जल के भी रोशन रहा हूँ ,,,
तेर  घर  मैं  भी  पड़ोसन  रहा  हों

बुधवार, 12 मई 2010

.....मुक्तक ....

अब अदालत में खड़ी मूरत रुआंसी हो रही है
अब  कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ  तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने   को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..

*******************************************************
कोई  अब  गीत  लिखूं  मैं  कैसे  
दर्द  को  मीत  लिखूं  मैं  कैसे  
अग्निशैय्या  पे  चीखती  लाशें  
जलता  संगीत  लिखूं  मैं  कैसे ..  

सोमवार, 10 मई 2010

...................... असर .......................

असर यूँ इश्क दिखलाने लगा है.
हाय  वो  हमसे  शर्माने  लगा है ..

देखता  देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .

पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..

ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..

यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं ) 

अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब  मजा उसको भी आने लगा है ...


हाय वो हमसे शर्माने लगा है..

रविवार, 7 मार्च 2010

to kya ho

लाज बचाने को जब अपनी , सारे  अपनों से हारी 
पांच पति नतमस्तक बैठे , बची न किंचित भी सारी 
क्यों न जला डाले राखी को और मिटा डाले सिंदूर 
परिभाषित हो अबला क्यों जब शक्ति स्वरूपा है नारी .. 
*****************************************
कहीं  सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिमट जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें एक छोटी सी दुनिया सफीने में
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा. .
************************************************
ये न कहना , तुम न आओगे
कैसे ख्वाबों का दिल दुखाओगे
और आओगे तुम जो उल्फत में
इस जमाने को क्या बताओगे ...
************************************
आदमी बँट गया गुनाहों में
कशमकश कितनी उसकी राहों में
आ गया देर रात घर फिर भी
मन है सोया किसी कि बाहों में.....
******************************************

गुरुवार, 4 मार्च 2010

ishq tu bara vo hai

पूछते वो रहे ,,हम बता ना सके
रिश्ता उनका मेरा , मेरा उनसे है क्या
इश्क सारी हँदों से गुज़र भी गया
खींचते वो रहे सरहदें दरम्यान

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

..वो कैसे खेले होली ..

वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली

पिछली पगार मजदूरी की, खा गई मुआ महंगी रोटी
भूखे पेट नहीं भाती,,बाजारों में लटकी धोती
बस एक बची झीनी चुनर ,,बस एक बची है चोली

वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली

होली  थी  गाँव  शहर  मैं  जब  
सीमा  पर  भी  फागुन  आया
साजन  ने  भी  खेली  होली
सरहद  से  संदेसा  आया  

माँ  का  लाल  लाल  रंग  रंग  
खा  सीने  पर  गोली  

वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली


हरा  लड़े  सफ़ेद  से  और
केसरिया  से  भी  जंग  चली 
और  सियासत  के  झांसे  में
पीकर  भंग  चली

तीनों  रंग  मिले  तो  मान  का
आँचल  बने  रंगोली  

वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली


मन  की  गम  है  दुनिया  में  
मन  की  मजबूरी  भी  है
पर  आंसू  सदा  नहीं  बहते  
जीवन  में  हंसी  जरूरी  है

सब  एक  रंग  में  रंग  जाएं
ये  देश  बने  एक  टोली


हम  ऐसे खेलें  होली ,,हम  सब  मिल  खेले  खेले होली

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

....मोहब्बत की कहानी .....

बच्चे दादी से मोहब्बत की  कहानी पूंछे
कैसी थी बीते ज़माने में जवानी पूंछे


पिया कि लाश पे सिन्दूर सती जाए
कैसे जौहर करें ये महलों कि रानी, पूंछे


कौन राधा थी कौन मीरा कौन थी रूक्मिण
कौन थी रानी और कौन दीवानी, पूँछे


क्यों तड़पती है दरिया से निकाली मछली
लगाये आग क्यों बरसात का पानी, पूंछे


मौत के बाद भी रूहों का भटकते रहाना
नूर क्यों ताज के चेहरे पे रूहानी, पूंछे


वो जो बक्से पे लिखा है मेरे दादा का नाम
छुपा के राखी भला कौन निशानी पूंछे


लाल चूनर , कमरबंद चन्द ख़त मैले
इनमे ठहरी रही दरिया कि रवानी पूंछे


भींगी आँखों  में जाने  कौन ठहर  कर  गुजरा  
हैं  तो नादान  मगर बात  सायानी  पूंछे