मंगलवार, 6 जुलाई 2010

तुम्हारी याद आई

जश्न- ए- गम मैं भी मना लूँ तो चलूँ 
ख़त मुहब्बत  के जला लूँ तो चलूँ ..

जिसने ये गम दिया वो अपने थे 
बात गैरों से छिपा लूँ तो चलूँ ..

मेरा क़ातिल बहुत ही नादाँ है
सुराग - ए- क़त्ल मिटा लूँ तो चलूँ..

चाँद भी ज़ार-ज़ार रोता है 
थपकियाँ दे के सुलालूं तो चलूँ ..

आज फिर से तुम्हारी याद आई 
आज फिर तुमको भुलालूं तो चलूँ ..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें