बुधवार, 12 मई 2010

.....मुक्तक ....

अब अदालत में खड़ी मूरत रुआंसी हो रही है
अब  कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ  तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने   को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..

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कोई  अब  गीत  लिखूं  मैं  कैसे  
दर्द  को  मीत  लिखूं  मैं  कैसे  
अग्निशैय्या  पे  चीखती  लाशें  
जलता  संगीत  लिखूं  मैं  कैसे ..  

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