जश्न- ए- गम मैं भी मना लूँ तो चलूँ
ख़त मुहब्बत के जला लूँ तो चलूँ ..
जिसने ये गम दिया वो अपने थे
बात गैरों से छिपा लूँ तो चलूँ ..
मेरा क़ातिल बहुत ही नादाँ है
सुराग - ए- क़त्ल मिटा लूँ तो चलूँ..
चाँद भी ज़ार-ज़ार रोता है
थपकियाँ दे के सुलालूं तो चलूँ ..
आज फिर से तुम्हारी याद आई
आज फिर तुमको भुलालूं तो चलूँ ..
ये मेरी नितांत मौलिक रचनाएं हैं ... मेरे ह्रदय की भाषा .. जिन्हें मैं बस यूँ ही कह लेता हूँ ... कोई समझ लेता है ....
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
प्यार कर बैठा
ये मैं कैसा गुनाह कर बैठा
एक मुसाफिर था प्यार कर बैठा .
मुझको मंजिल तलाशती ही रही
राह में क्यों मैं हार कर बैठा .
बेसबब मेरा दोस्त रोता है
कब से मेरी मजार पर बैठा .
सबने मुझको बड़ी नसीहत दी
फिर भी आँखें मैं चार कर बैठा...........
एक मुसाफिर था प्यार कर बैठा .
मुझको मंजिल तलाशती ही रही
राह में क्यों मैं हार कर बैठा .
बेसबब मेरा दोस्त रोता है
कब से मेरी मजार पर बैठा .
सबने मुझको बड़ी नसीहत दी
फिर भी आँखें मैं चार कर बैठा...........
बुधवार, 12 मई 2010
.....मुक्तक ....
अब अदालत में खड़ी मूरत रुआंसी हो रही है
अब कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..
*******************************************************
कोई अब गीत लिखूं मैं कैसे
दर्द को मीत लिखूं मैं कैसे
अग्निशैय्या पे चीखती लाशें
जलता संगीत लिखूं मैं कैसे ..
अब कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..
*******************************************************
कोई अब गीत लिखूं मैं कैसे
दर्द को मीत लिखूं मैं कैसे
अग्निशैय्या पे चीखती लाशें
जलता संगीत लिखूं मैं कैसे ..
सोमवार, 10 मई 2010
...................... असर .......................
असर यूँ इश्क दिखलाने लगा है.
हाय वो हमसे शर्माने लगा है ..
देखता देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .
पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..
ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..
यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं )
अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब मजा उसको भी आने लगा है ...
हाय वो हमसे शर्माने लगा है..
हाय वो हमसे शर्माने लगा है ..
देखता देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .
पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..
ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..
यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं )
अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब मजा उसको भी आने लगा है ...
हाय वो हमसे शर्माने लगा है..
सदस्यता लें
संदेश (Atom)