शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

प्यार कर बैठा

ये  मैं  कैसा  गुनाह  कर  बैठा  
एक  मुसाफिर  था  प्यार  कर  बैठा .
मुझको  मंजिल तलाशती ही रही 
राह में क्यों मैं हार कर बैठा .

बेसबब मेरा दोस्त रोता है 
कब से मेरी मजार पर बैठा .
सबने मुझको बड़ी नसीहत दी 
फिर भी आँखें मैं चार कर बैठा........... 

शनिवार, 12 जून 2010

किया क्यों तुमने ऐसा काम
राम  रहीम    रब ईसा   
हाय!  रख लिए कितने नाम.....

शुक्रवार, 14 मई 2010

यूँ  तो  मैं जल के भी रोशन रहा हूँ ,,,
तेर  घर  मैं  भी  पड़ोसन  रहा  हों

बुधवार, 12 मई 2010

.....मुक्तक ....

अब अदालत में खड़ी मूरत रुआंसी हो रही है
अब  कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ  तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने   को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..

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कोई  अब  गीत  लिखूं  मैं  कैसे  
दर्द  को  मीत  लिखूं  मैं  कैसे  
अग्निशैय्या  पे  चीखती  लाशें  
जलता  संगीत  लिखूं  मैं  कैसे ..  

सोमवार, 10 मई 2010

...................... असर .......................

असर यूँ इश्क दिखलाने लगा है.
हाय  वो  हमसे  शर्माने  लगा है ..

देखता  देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .

पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..

ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..

यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं ) 

अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब  मजा उसको भी आने लगा है ...


हाय वो हमसे शर्माने लगा है..

रविवार, 7 मार्च 2010

to kya ho

लाज बचाने को जब अपनी , सारे  अपनों से हारी 
पांच पति नतमस्तक बैठे , बची न किंचित भी सारी 
क्यों न जला डाले राखी को और मिटा डाले सिंदूर 
परिभाषित हो अबला क्यों जब शक्ति स्वरूपा है नारी .. 
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कहीं  सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिमट जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें एक छोटी सी दुनिया सफीने में
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा. .
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ये न कहना , तुम न आओगे
कैसे ख्वाबों का दिल दुखाओगे
और आओगे तुम जो उल्फत में
इस जमाने को क्या बताओगे ...
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आदमी बँट गया गुनाहों में
कशमकश कितनी उसकी राहों में
आ गया देर रात घर फिर भी
मन है सोया किसी कि बाहों में.....
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गुरुवार, 4 मार्च 2010

ishq tu bara vo hai

पूछते वो रहे ,,हम बता ना सके
रिश्ता उनका मेरा , मेरा उनसे है क्या
इश्क सारी हँदों से गुज़र भी गया
खींचते वो रहे सरहदें दरम्यान