मंगलवार, 29 नवंबर 2011

पिघल रहा है मेरा अक्स

जिन  ग़मों  को    उँगलियाँ  पकड़ाई  बचपन  मे   

वो  जवान  होकर  मेरे  सीने   को  रौंदैं  हैं 

टीस  अब  तो  बह  चली  नयनों  के  गोमुख  से 

दिल  में  बन  तूफ़ान  कोई  बिजली  सा  कौंधें  है||



कोई  है  जो  बहुत  उदास  सा  है 

लगा  ऐसे  कि  दिल  के  पास  सा  है

 
बेवफा  है   वो  दगाबाज  भी    है 

 ..
मगर  फिर  भी  मेरे  विश्वास  सा  है||




पिघल  रहा  है  मेरा  अक्स  खो  रहा    हूँ   मैं  

अपना  चेहरा  हथेलियों  मैं  धो  रहा   हूँ   मैं||

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

करवा चौथ ..

तुम न मानो मगर ये है तो है 
कु छ मेरा तुम पे असर है  तो है 
मेरी जानिब न देखे है साकी 
मेरी सकी पे नज़र है तो है.... १४.१०.११.

मुफलिसी में भी माँ को मिले रोटियां 
इसलिए लौटती घर सुबह बेटियां ..१४.१०.

ऐसा तराशा तुमने की बिकना पड़ा मुझे 
बे मन ही बाज़ारों में सजना पड़ा मुझे.. १४.१० 



गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जद्दोजेहद

मैं रूठ जाऊं जो तू मनाये 
ये जद्दोजेहद बहुत हंसी है ..
तुम्हारी नज़रें जाता रही हैं 
हुयी मुहब्बत अभी -अभी है ... २१-९-11


हाँ मैं कातिल हूँ गुनाहगार नहीं
तेरा प्यासा हूँ तलबगार नहीं.. २२-९-11

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

15-9-11

चले गए और खुद को मेरे पास छोड़ गए 
बे सलीका है अदा तेरे बिछड़ जाने की... 

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

सजनी सोवतु सेज अकेली

सजनी सोवतु सेज अकेली 
रिम झिम - रिमझिम पावन सावन 
परत फुहार लगत मन भावन
आवन कह नहीं आये साजन
काटत सून हवेली .

उधरत तुरपन अंगिया मोरी 
देवरा करत बहुत बरजोरी 
ऐंठी कलाई पीठी लगावत 
करत कपोल ठिठोली ..
सजनी सोवतु सेज अकेली

सोमवार, 15 अगस्त 2011

सुन लो प्रिये

   मन कोलाहल करे तो करे क्यों भला
   सुन सको तो मेरा मौन सुन लो प्रिये... ०१-०८-११

 तुम अहसास हो तुम नहीं मिटते कभी 
जी रहा है कोई तेरी आस में कहीं ...२३-५-11

सोमवार, 1 अगस्त 2011

मैं तेरा श्रृंगार .....

तुम मेरी सुगंधि हो संगिनी  
मैं  तेरा श्रृंगार ..
प्रीती रीति अरु नीति अलौकिक 
कर लो अंगीकार ....   १-८-११
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मंजिल मिल  ही जाएगी ......
भटक कर ही सही ......
गुमराह तो वो हैं जो ..
घर से निकले ही नहीं.. १३-७-११
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सहमा -सहमा हूँ मैं किसी डर से 
किसकी आँखों से ये लहू बरसे 
जिसके दिल से दुआ निकलती थी 
उसकी इक बद्दुआ को दिल तरसे .११-७-11
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प्रेम तर्कों में घुट के मर जाए 
ये तमाशा भी हो गुज़र जाए ..१-७-११
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बिना लिबास आये थे इस जहां में 
बस इक कफ़न की खातिर इतना सफ़र करना पड़ा . ७-७-११
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