तुम मेरी सुगंधि हो संगिनी
मैं तेरा श्रृंगार ..
प्रीती रीति अरु नीति अलौकिक
कर लो अंगीकार .... १-८-११
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मंजिल मिल ही जाएगी ......
भटक कर ही सही ......
गुमराह तो वो हैं जो ..
घर से निकले ही नहीं.. १३-७-११
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सहमा -सहमा हूँ मैं किसी डर से
किसकी आँखों से ये लहू बरसे
जिसके दिल से दुआ निकलती थी
उसकी इक बद्दुआ को दिल तरसे .११-७-11
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प्रेम तर्कों में घुट के मर जाए
ये तमाशा भी हो गुज़र जाए ..१-७-११
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बिना लिबास आये थे इस जहां में
बस इक कफ़न की खातिर इतना सफ़र करना पड़ा . ७-७-११
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