तू जमीन है तू आसमान है मेरा
तू ही जन्नत है तू ही हूर भी है
होश है तू है तू ही मदहोशी
नशा भी तू नशे में चूर भी है
खो न दूं तुमको ये darr भी है
तू तो मेरी है ये गुरूर भी है
ये मेरी नितांत मौलिक रचनाएं हैं ... मेरे ह्रदय की भाषा .. जिन्हें मैं बस यूँ ही कह लेता हूँ ... कोई समझ लेता है ....
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
बुधवार, 11 अगस्त 2010
क्या होगा.. ????
कहीं सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिहर जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें , एक छोटी - सी दुनियां सफीने में ...
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा ????
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिहर जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें , एक छोटी - सी दुनियां सफीने में ...
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा ????
रविवार, 18 जुलाई 2010
नज़रों से काम लेता है ..
अश्क आँखों में थाम लेता है
अब तो कम कम वो जाम देता है
क़त्ल का उसके सलीका है अज़ब
सिर्फ नज़रों से काम लेता है ..
उसके होंठों पे एक लर्जिश है
हाय वो मेरा नाम लेता है
रिंद कोई न आएगा कल से
साकी तू दूना दाम लेता है ...
अब तो कम कम वो जाम देता है
क़त्ल का उसके सलीका है अज़ब
सिर्फ नज़रों से काम लेता है ..
उसके होंठों पे एक लर्जिश है
हाय वो मेरा नाम लेता है
रिंद कोई न आएगा कल से
साकी तू दूना दाम लेता है ...
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
मैंने चाहा तुझको
मैं अपनी नज़रों से नज़रें मिला नहीं पाया
मैं आईने में कभी मुस्कुरा नहीं पाया ..
मुझे पता ही नहीं देखता मुझे कोई
मैं अपने साए में खुद को छिपा नहीं पाया ..
सभी खताओ से ज्यादा बड़ी खता ये हुई
बताना चाहा तुझे पर बता नहीं पाया ..
तेरी नज़र से गिरा तुमने उठाया झुक कर
मैं खुद की नज़रों में खुद को उठा नहीं पाया..
जुल्म इक और करूँ बस इसी लिए जिंदा
मैंने चाहा तुझको ये जता नहीं पाया ..
मैं आईने में कभी मुस्कुरा नहीं पाया ..
मुझे पता ही नहीं देखता मुझे कोई
मैं अपने साए में खुद को छिपा नहीं पाया ..
सभी खताओ से ज्यादा बड़ी खता ये हुई
बताना चाहा तुझे पर बता नहीं पाया ..
तेरी नज़र से गिरा तुमने उठाया झुक कर
मैं खुद की नज़रों में खुद को उठा नहीं पाया..
जुल्म इक और करूँ बस इसी लिए जिंदा
मैंने चाहा तुझको ये जता नहीं पाया ..
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
तुम्हारी याद आई
जश्न- ए- गम मैं भी मना लूँ तो चलूँ
ख़त मुहब्बत के जला लूँ तो चलूँ ..
जिसने ये गम दिया वो अपने थे
बात गैरों से छिपा लूँ तो चलूँ ..
मेरा क़ातिल बहुत ही नादाँ है
सुराग - ए- क़त्ल मिटा लूँ तो चलूँ..
चाँद भी ज़ार-ज़ार रोता है
थपकियाँ दे के सुलालूं तो चलूँ ..
आज फिर से तुम्हारी याद आई
आज फिर तुमको भुलालूं तो चलूँ ..
ख़त मुहब्बत के जला लूँ तो चलूँ ..
जिसने ये गम दिया वो अपने थे
बात गैरों से छिपा लूँ तो चलूँ ..
मेरा क़ातिल बहुत ही नादाँ है
सुराग - ए- क़त्ल मिटा लूँ तो चलूँ..
चाँद भी ज़ार-ज़ार रोता है
थपकियाँ दे के सुलालूं तो चलूँ ..
आज फिर से तुम्हारी याद आई
आज फिर तुमको भुलालूं तो चलूँ ..
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