किया क्यों तुमने ऐसा काम
राम रहीम रब ईसा
हाय! रख लिए कितने नाम.....
ये मेरी नितांत मौलिक रचनाएं हैं ... मेरे ह्रदय की भाषा .. जिन्हें मैं बस यूँ ही कह लेता हूँ ... कोई समझ लेता है ....
शनिवार, 12 जून 2010
बुधवार, 12 मई 2010
.....मुक्तक ....
अब अदालत में खड़ी मूरत रुआंसी हो रही है
अब कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..
*******************************************************
कोई अब गीत लिखूं मैं कैसे
दर्द को मीत लिखूं मैं कैसे
अग्निशैय्या पे चीखती लाशें
जलता संगीत लिखूं मैं कैसे ..
अब कहाँ इस मुल्क में कातिल को फांसी हो रही है
यूँ तो नंगे हम सभी हैं पर कसार इतनी सी है
आईने को देखने में कुछ हया-सी हो रही है ..
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कोई अब गीत लिखूं मैं कैसे
दर्द को मीत लिखूं मैं कैसे
अग्निशैय्या पे चीखती लाशें
जलता संगीत लिखूं मैं कैसे ..
सोमवार, 10 मई 2010
...................... असर .......................
असर यूँ इश्क दिखलाने लगा है.
हाय वो हमसे शर्माने लगा है ..
देखता देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .
पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..
ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..
यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं )
अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब मजा उसको भी आने लगा है ...
हाय वो हमसे शर्माने लगा है..
हाय वो हमसे शर्माने लगा है ..
देखता देर तक अदा अपनी
आईने से वो इतराने लगा है . .
पूछता हाल उसका है मुझसे
ज़माना मारने ताने लगा है ..
ख़त में जो उसको लिखे थे मैंने
गीत महफ़िल में वो गाने लगा है..
यूँ तो घर उसका उस तरफ से है
इसतरफ से वो अब जाने लगा है .. (पहले ही रोक दिया होता तो बिगरता नहीं )
अब वो उतना नहीं.... नहीं..... करता
अब मजा उसको भी आने लगा है ...
हाय वो हमसे शर्माने लगा है..
रविवार, 7 मार्च 2010
to kya ho
लाज बचाने को जब अपनी , सारे अपनों से हारी
पांच पति नतमस्तक बैठे , बची न किंचित भी सारी
क्यों न जला डाले राखी को और मिटा डाले सिंदूर
परिभाषित हो अबला क्यों जब शक्ति स्वरूपा है नारी ..
*****************************************
कहीं सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिमट जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें एक छोटी सी दुनिया सफीने में
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा. .
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ये न कहना , तुम न आओगे
कैसे ख्वाबों का दिल दुखाओगे
और आओगे तुम जो उल्फत में
इस जमाने को क्या बताओगे ...
************************************
आदमी बँट गया गुनाहों में
कशमकश कितनी उसकी राहों में
आ गया देर रात घर फिर भी
मन है सोया किसी कि बाहों में.....
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पांच पति नतमस्तक बैठे , बची न किंचित भी सारी
क्यों न जला डाले राखी को और मिटा डाले सिंदूर
परिभाषित हो अबला क्यों जब शक्ति स्वरूपा है नारी ..
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कहीं सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा
तुम्हारा अक्स दर्पण में सिमट जाए तो क्या होगा
चलो लेकर चलें एक छोटी सी दुनिया सफीने में
तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा. .
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ये न कहना , तुम न आओगे
कैसे ख्वाबों का दिल दुखाओगे
और आओगे तुम जो उल्फत में
इस जमाने को क्या बताओगे ...
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आदमी बँट गया गुनाहों में
कशमकश कितनी उसकी राहों में
आ गया देर रात घर फिर भी
मन है सोया किसी कि बाहों में.....
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गुरुवार, 4 मार्च 2010
ishq tu bara vo hai
पूछते वो रहे ,,हम बता ना सके
रिश्ता उनका मेरा , मेरा उनसे है क्या
इश्क सारी हँदों से गुज़र भी गया
खींचते वो रहे सरहदें दरम्यान
रिश्ता उनका मेरा , मेरा उनसे है क्या
इश्क सारी हँदों से गुज़र भी गया
खींचते वो रहे सरहदें दरम्यान
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
..वो कैसे खेले होली ..
वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली
पिछली पगार मजदूरी की, खा गई मुआ महंगी रोटी
भूखे पेट नहीं भाती,,बाजारों में लटकी धोती
बस एक बची झीनी चुनर ,,बस एक बची है चोली
पिछली पगार मजदूरी की, खा गई मुआ महंगी रोटी
भूखे पेट नहीं भाती,,बाजारों में लटकी धोती
बस एक बची झीनी चुनर ,,बस एक बची है चोली
वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली
होली थी गाँव शहर मैं जब
सीमा पर भी फागुन आया
साजन ने भी खेली होली
सरहद से संदेसा आया
माँ का लाल लाल रंग रंग
खा सीने पर गोली
वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली
हरा लड़े सफ़ेद से और
केसरिया से भी जंग चली
और सियासत के झांसे में
पीकर भंग चली
तीनों रंग मिले तो मान का
आँचल बने रंगोली
वो कैसे खेले होली ,,वो किससे खेले होली
मन की गम है दुनिया में
मन की मजबूरी भी है
पर आंसू सदा नहीं बहते
जीवन में हंसी जरूरी है
सब एक रंग में रंग जाएं
ये देश बने एक टोली
हम ऐसे खेलें होली ,,हम सब मिल खेले खेले होली
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