ये मेरी नितांत मौलिक रचनाएं हैं ... मेरे ह्रदय की भाषा .. जिन्हें मैं बस यूँ ही कह लेता हूँ ... कोई समझ लेता है ....
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
तू मेरे पास भी है और दूर भी है..
मेरी बाहों में छिपी है .. मजबूर भी है...
दुनिया बहुत बड़ी सही कूप मंडूकता उससे जीत जाती है ,,, मैं वापस आ गया ,, अच्छा लगा वापस आना ,, जैसे कहीं गया ही न था ,, तुम फिर मिल गए ,,, वहीँ खडे मेरे इंतजार मैं ,, कुछ नहीं बदला ,,, दुनिया बड़ी है तो ठेंगे से
कहीं सिमटा हुआ एक पल बिखर जाए तो क्या होगा तुम्हारा अक्स दर्पण में सिहर जाए तो क्या होगा चलो लेकर चलें , एक छोटी - सी दुनियां सफीने में ... तुम्हारा प्यार जीवन से निकल जाए तो क्या होगा ????
मैं अपनी नज़रों से नज़रें मिला नहीं पाया मैं आईने में कभी मुस्कुरा नहीं पाया .. मुझे पता ही नहीं देखता मुझे कोई मैं अपने साए में खुद को छिपा नहीं पाया .. सभी खताओ से ज्यादा बड़ी खता ये हुई बताना चाहा तुझे पर बता नहीं पाया .. तेरी नज़र से गिरा तुमने उठाया झुक कर मैं खुद की नज़रों में खुद को उठा नहीं पाया.. जुल्म इक और करूँ बस इसी लिए जिंदा मैंने चाहा तुझको ये जता नहीं पाया ..