बुधवार, 1 जून 2011

बज़्म में ग़ज़ल मेरी..

मेरे ज़ज्बात का सबने लगाया अंदाजा 
सबको अपनी सी लगी बज़्म में ग़ज़ल मेरी.. 

कोई तरकीब तो हो तुमको भुला दूँ मैं भी 
याद में तेरी जली बज़्म में ग़ज़ल मेरी ..

ठुमक - ठुमक के चली बज़्म में ग़ज़ल मेरी 
हर एक शै से मिली बज़्म में ग़ज़ल मेरी..

बिक रही है सरे बाज़ार चंद सिक्कों में 
अब तो रोटी पे बिकी बज़्म में ग़ज़ल मेरी .. 

लोग झुमका तलाशते हैं जिन बाजारों में 
वहीँ कहीं पे गिरी बज़्म में ग़ज़ल मेरी .........२९-४-११

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