मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

हम भी क़त्ल को चुपचाप सहने लगे..

वो मेरे दिल में आके रहने  लगे  
लोग इसको गुनाह कहने लगे .... 

जब हुआ कब्ज़ा किनारे चुप थे 
शोर  बरपा  जो  शहर  बहने   लगे ..

जब से तुमको खुदा बनाया है 
सारे मस्जिद जहाँ के ढहने  लगे .. 

खता कुछ तो है कातिल की मगर
हम भी क़त्ल को चुप सहने लगे..


तब अमावस याद आया मुझको बहुत
चांदनी मैं ये बदन दहने लगे


२८.दिसंबर 2010

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

कुछ फुटकर भाव

रोग कैसा लगा लिया तुमने.. 
खुद को ही आजमा लिया तुमने...
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थपकियाँ देलूँ सुला लूँ तुमको
आओ थोडा सा रुला लूँ तुमको
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तुम गीत बनकर मेरे लबो पर ठहर गए
मैं सो न सका रात के सारे पहर गए
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२२-१२-२०१०

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

मोहब्बत हो न जाये

मुझे तुमसे मोहब्बत हो न जाये 
सुकून मेरा कहीं पे खो न जाये 

इरादा तो है तुमको चूम लूँ पर 
तुम्हारा गाल जूठा हो न जाये
 
लोरी मां की अधूरी  रह ही गई है 
कहीं वो सुनते सुनते सो न जाए

रविवार, 5 दिसंबर 2010

आपका - अखिलेश

मित्रो ! आपका स्नेह मुझे मिलता रहता है.. कई बार मै व्यस्त होने की वजह से उत्तर नहीं दे पाता... आपसब क्षमा के साथ अपना स्नेह बनाए रखेंगे ... आपका - अखिलेश
मुफलिसी मुह चिढाती कुबेरों को है.
रेत पर जिंदा रहने लगी मछलियाँ ..
बज़्म में खून से कुछ सने हाथ हैं
उजले कपडे में वे हैं बड़ी हस्तियाँ ..