मैं रूठ जाऊं जो तू मनाये
ये जद्दोजेहद बहुत हंसी है ..
तुम्हारी नज़रें जाता रही हैं
हुयी मुहब्बत अभी -अभी है ... २१-९-11
हाँ मैं कातिल हूँ गुनाहगार नहीं
तेरा प्यासा हूँ तलबगार नहीं.. २२-९-11
ये मेरी नितांत मौलिक रचनाएं हैं ... मेरे ह्रदय की भाषा .. जिन्हें मैं बस यूँ ही कह लेता हूँ ... कोई समझ लेता है ....