मंगलवार, 28 अगस्त 2012

कल 'मरणोपरांत' नाटक देखने से उपजे शेर ... लखनऊ ..

मेरे वजूद में वफ़ा से ऊब कर कोई 
हर वक्त एक नयी वेवफाई तलाशे ..

मैं दिल पे उसके दुनिया नयी तो बसा गया 
पर गैर उँगलियों के निशाँ कैसे मिटाता ..

अजीब कशमकश है तुम्हारे वजूद में 
क्यों चाहता हूँ तुमको कोई और न चाहे ..

बस इतनी बात सुनकर हूँ सुकूं में दर्द कुछ कम है 
तू मेरी फ़िक्र का है जिक्र करती उसकी बाहों में ..

त्रिशंकु ही रहा मेरा सफर मंजिल कहाँ मिलती 
तेरी दुत्कार में भी प्यार झलक जाए है ..

सोमवार, 6 अगस्त 2012

२१.१२.२०११

कोई सुन लेगा तो अफसाना बना देगा ही 
ऐसे जाना मेरे दिल से कोई आहट न हो .. २१ . १२. २०११